Monday, 5 September 2011

शिक्षक दिवस: क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ‘शिक्षकों’ के मथ्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए

 आज शिक्षक दिवस है। सारे अखबार या तो शिक्षकों की बदहाली अथवा प्रशंसा से भरे हुए हैं। अच्छी बात है, जो शिक्षक हमें एक सफल सामाजिक प्राणी बनाने के लिए अपनी रचनात्मक भूमिका निभाकर एक महान कार्य करता है, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रदर्शित करना एक सुशिक्षित व्यक्ति के लिए लाज़मी है और दूसरी और इस महती सामाजिक कार्य की जिम्मेदारी उठाने वाली महत्वपूर्ण इकाई के प्रति सरकार के असंवेदनशील रुख की भर्त्सना करना भी उतना ही ज़रूरी है।
    सरकार का शिक्षकों को दोयम दर्ज़े के सरकारी कर्मचारी की तरह ट्रीट करना, उनके वेतन, भत्तों, सुख-सुविधाओं के प्रति दुर्लक्ष्य करना, उन्हें जनगणना, पल्स पोलियों, चुनाव आदि-आदि कार्यों में उलझाकर शिक्षा के महत्वपूर्ण कार्य से विमुख करना, इनके अलावा और भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो एक शिक्षक की भूमिका और महत्व को सिरे से खारिज करते से लगते हैं। लेकिन, इस सबसे परे, शिक्षकों की अपनी कमज़ोरियों, अज्ञान, कुज्ञान, अवैज्ञानिक चिंतन पद्धति, भ्रामक एवं असत्य धारणाओं के वाहक के रूप में समाज में सक्रिय गतिशीलता के कारण आम तौर पर मानव समाज का और खास तौर पर भारतीय समाज का कितना नुकसान हो रहा है, यह हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है।
  
  पिछले दो-तीन सौ साल मानव सभ्यता के करोड़ों वर्षों के इतिहास में, विज्ञान के विकास की स्वर्णिम समयावधि रही है। इस अवधि में प्रकृति, विश्व ब्रम्हांड एवं मानव समाज के अधिकांश रहस्यों पर से पर्दा उठाकर सभ्यता ने व्यापक क्रांतिकारी करवटें ली हैं। एक अतिप्राकृतिक सत्ता की अनुपस्थिति का दर्शन भी इसी युग में आविर्भूत हुआ है जिसकी परिणति दुनिया भर में मध्ययुगीन सामंती समाज के खात्में के रूप में हुई थी जिसका अस्तित्व ही ईश्वरीय सत्ता की अवास्तविक अवधारणा पर टिका हुआ था।
    भारतीय समाज में सामंती समाज की अवधारणाओं, मूल्यों का पूरी तौर पर पतन आज तक नहीं हो सका है और ना ही वैज्ञानिक अवधारणाओं की समझदारी, आधुनिक चिंतन, विचारधारा का व्यापक प्रसार ही हो सका है। बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस समाज में ’सत्य-सत्य‘ का डोंड सामंती समय से ही पीटा जाता रहा हो उस समाज में ’सत्य‘ सबसे ज़्यादा उपेक्षित रहा है।
   
 हमें आज़ाद हुए 64 वर्ष से ज़्यादा हो गए, देश आज भी सामंत युगीय अज्ञान एवं कूपमंडूकता की गहरी खाई में पड़ा हुआ है। धर्म एवं भारतीय संस्कृति के नाम अवैज्ञानिक क्रियाकलापों कर्मकांडों का ज़बरदस्त बोलबाला हमारे देश में देखा जा सकता है। 
क्या शिक्षक का यह कर्त्तव्य नहीं था कि वह ’सत्यानुसंधान‘ के अत्यावश्यक रास्ते पर चलते हुए भारतीय समाज को इस अंधे कुएँ से बाहर निकालें ?
 क्या ’धर्म‘ की सत्ता को सिरे से ध्वस्त कर स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे की संस्कृति को रोपने, वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर भारतीय समाज का पुनर्गठन करने की जिम्मेदारी ’शिक्षकों‘ की नहीं थी ? 
क्या शिक्षा के ज़रिए अज्ञान का अंधकार दूर ना कर पाने का भयानक अपराध ’शिक्षकों‘ के मथ्थे नहीं मढ़ा जाना चाहिए जिसने हमारे देश को सदियों पीछे रख छोड़ा है ? 
क्या मध्ययुगीन अवधारणाओं के दम पर विश्व गुरू होने का फालतू दंभ चूर चूर कर, वास्तव में ज्ञान की वह ’सरिता‘ प्रवाहित करना एक अत्यावश्यक ऐतिहासिक कार्य नहीं था जिसके ना हो सकने का अपराध किसी और के सिर पर नहीं प्रथमतः शिक्षकों के ही सिर पर है।
    
अब भी समय है, प्रकृति मानव समाज एवं विश्व ब्रम्हांड के सत्य को गहराई में जाकर समझने और एकीकृत ज्ञान के आधार पर भारतीय समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने की लिए प्रत्येक शिक्षक आज भी अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकता है, बशर्ते वह अपने तईं ना केवल ईमानदार हो बल्कि सत्य के लिए प्राण तक तजने को तैयार हो।

16 comments:

  1. hamara environment hi aisa hai jo itni jaldi nahi badal sakta
    haan par sudhar ki puri gunjaish hai agar insan chahe.
    achi post

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  2. अब भी समय है, प्रकृति मानव समाज एवं विश्व ब्रम्हांड के सत्य को गहराई में जाकर समझने और एकीकृत ज्ञान के आधार पर भारतीय समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने की लिए प्रत्येक शिक्षक आज भी अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकता है, बशर्ते वह अपने तईं ना केवल ईमानदार हो बल्कि सत्य के लिए प्राण तक तजने को तैयार हो।

    बहुत खूब कहा है
    आपके विचारो का स्वागत है

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  3. अपूर्वा मंडलोईMonday, September 05, 2011 7:02:00 pm

    हाँ एक शिक्षक को चाहिए की उसकी क्या जिम्मेदारियां है समाज के प्रति
    एक अछे नागरिक के निर्माण के लिए
    एक शिक्षक और माता-पिता का जागरूक होना बहुत ज़रूरी है
    खुबसूरत पोस्ट
    में खुद एक शिक्षिका हु
    पढ़ कर बेहद्द अच्छी लगी

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  4. You are just Revaluating the system developed over the years... But remember that everything present is by easiness not by choice. I am not criticizing the post. But the fact is recalling the values of a teacher is not worth in improving performance in any manner,by this we are blackmailing them emotionally. This will even worth for two days but the raw social rules are always above emotions. The work of a teacher is to guide us, but taking the advantage of their goodies we expect them to insure our better future. They are same for all of us but still in a class when a kid fail the teacher is faulty and if he is topper he is only credited to be genious. The teacher was same for both but still the result was polar, why??? He taught his best then where was his fault? And why should he be responsible for society transformation? They have done their work without discrimination. The true fact is we are only responsible for our conditions. When money factor comes we bypass all our learnings and make the deal. And when this thing is analysed from social point of view, we become innocent like we did in our childhood when we failed and the sweet teacher took the guilt on himself to protect us from society...

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  5. अपने कमेंट्स के लिए बहुत बहुत शुक्रिया दोस्तों..
    और हाँ शुभम जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ..

    मेरा कहना ये बिलकुल नहीं की एक शिक्षक ने अपना योगदान नहीं दिया हमारे विकास में..
    उनकी अहमियत क्या है हमारी ज़िन्दगी में हमारे समाज में, ये में और आप अच्छी तरह जानते हैं..

    हम कहाँ है बात ये नहीं, हमारी सोच कहाँ है ये ज़रूरी है,
    हाँ जो आज हमारी स्थिति है उसके लिए हम खुद ज़िम्मेदार हैं,
    पर
    जो भी हम आज हैं जो भी हमारे विचार आज हैं, वो सिर्फ और सिर्फ अपने आस-पास के माहौल और हमारी सोच के कारण हैं..
    और हमारी सोच बनाने वालो में एक होता है शिक्षक..

    और ये बात कागज़ पर समझने के बजाये आप अपने आस-पास के माहोल या अपने कार्य क्षेत्र वर्ग को महसूस करके देख सकते हैं..

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  6. haan ek teacher ka kaam sirf hame guide karna hai
    par hum uske guidance se hi to apna way define karte hain
    sahi mayne me ek teaching level me sudhar ki zarurat.
    par itne sab se kuch nahi hoga, rasta ek hai aur rokne wali wajah hazaro!

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  7. सलीम मोहम्मद शेखTuesday, September 06, 2011 11:15:00 pm

    सारी जिम्मेदारियां एक शिक्षक पर थोपना तो नाइंसाफ़ी है
    हम सभी का जागरूक होना ज़रूरी है
    और हाँ जनाब, सुधार की गुंजाईश ज़रूर है
    इस समाज के लिए किये त्याग के लिए हर शिक्षक को सलाम

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  8. kuch pahlu zindagi ke aise hote hain, jahan chup rahna jyada better hota hai
    aur
    filhal unhi kuch pahluo me se ek topic is thread me chal raha hai
    hame koi satisfactory jawab nahi milega
    na khud se aur na dusro se

    is sawal ko sawal hi rahne dein sabhi plz

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  9. shikshak diwas ki badhai sabhi ko

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