Friday, 30 December 2011

मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..







दोस्तों, काफी दिनों से एक दिली इच्छा थी की अपनी ये पंक्तियाँ आप सब के बीच शेयर करू....
और देखिये
आखिर आज साल के आखिरी दिन हमें ये मौका मिल ही गया...!
:)
आप सभी के विचार संग्रहणीय होंगे... 




मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..

खेल न पायी बचपन में,
झिड़की-तानो से खेली!
खूब सताया
निबल बताया,
कितनी आफत झेली!


समझ न पाए
नारी का मन
बस कह दिया पहेली!
अब मेरे घर भी पढ़े
जमीलो, फूलो और चमेली!
मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..


हमको कभी न
मानुस समझा,
समझा गुड़ की भेली!
चीज़ सजाने की माना,
दमका ली महल-हवेली!

बचपन से ही बोझ कहा,
सारी आज़ादी ले ली!
हाथ की रेखा
बदली मैंने,
देखो मेरी हथेली!
मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..


दुनिया भर की खबरे बांचे,
समझे सभी पहेली,
अब न दबेगी,
अब न सहेगी,
समझो नहीं अकेली!

ओ भारत के नए ज़माने,
तेरी नारी नवेली!
पढ़-लिख कर अब
नयी चेतना से
दमको अलबेली!
मैं तो पढ़-लिख गयी सहेली..

20 comments:

  1. परिवार की समृद्धि के लिए नारी को शिक्षित होना जरूरी है। बालिकाओं को पढ़ाकर ही हम पूर्वजों के ऋण से मुक्त हो सकते हैं। शिक्षित नारी ही आने वाली पीढ़ी की तारणहार होगी।
    बहुत ही उम्दा सुमीत जी

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  2. सही ही तो है आज परिस्थितियाँ इतनी बदल चुकी हैं कि समाज में स्त्रियों को भी कार्य करने के लिये तैयार रहना चाहिये।इस कार्य के लिये स्त्रियाँ तभी तैयार होंगी जब कि उनको शिक्षित किया जाएगा। एक कुशल ग्रहणी के लिये शिक्षित होना अनिवार्य है। समाज में स्त्री-शिक्षा को अनिवार्य किया जाना चाहिये। आज जीवन के हर क्षेत्र में नारी पुरुष के साथ न्धे से कन्धा मिलाकर चल रही है तो इस बात को देखते हुए हम दृढ़ता से कह सकते हैं कि स्त्रियों का शिक्षित होना अति आवश्यक है और वास्तव में शिक्षा के द्वारा ही हम जीवन के हर क्षेत्र को सुचारु रुप से देख सकते हैं। शिक्षा से नारी में अनेक गुणों का समावेश हो जाता है। जैसे मस्तिष्क का विकास , स्वास्थ्य में सुधार , अपने ग्हस्थ की सुचारु रुप से देखभाल करना , आत्म निर्भरता , व्यवहार में कुशल होना आदि।

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  3. खुबसूरत और प्रेरक
    पुरुष और नारी ने सभ्यता के आदिकाल से ही मिलजुल कर अपनी समस्याओं को हल किया है| अपनी जीवन यात्रा को हर बाधा और अवरोध का एक हो कर सामना किया है|
    स्वतंत्र भारत में नारी के प्रति पुरुष-समाज के दृष्टिकोण में क्रन्तिकारी परिवर्तन हुआ हैं | आज उसे आर्थिक, सामाजिक और राजनेतिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामान साधन एवं सुविधाएँ प्राप्त है, जो पहले केवल पुरुषों अधिकार थी| जीवन के हर क्षेत्र में कंधे से कन्धा मिलाकर चलने वाली भारतीय नारी आज सभी विषयों में पुरुषों निरंतर होड़ करती जा रहीं हैं| उसकी शिक्षा दीक्षा और व्यक्तित्व के विकास के नव-जीवन क्षितिज दिन-दिन खुलतें जा रहें हैं,दिन-दिन उसके नए नए क्षेत्रों का विस्तार हो रहा हैं| निशचय ही वह दिन दूर नहीं जब भारतीये नारी पुरुष की सची सहचरी होने का गौरव प्राप्त करेगी|
    नारी -शिक्षा का एक और पहलू भी हैं ,जिस पर ध्यान दिए बिना कम नहीं चलता |संघर्षशील प्रकृति होने के नाते पुरुष अपनी सामाजिक आवश्यकताओ कि पूर्ति के लिए समाज से सततसंघर्ष करता हैं |
    अत शिक्षा स्त्री का वहमहत्वपूर्ण अंग हैं ,जिसके बिना नारी अधूरी रह जाएगी नारीअपने शील और धर्य आदि गुणों के कारण घर क़ी अनेक समस्याओं को सहज ही कुशलता से ,परिश्रम और सतर्कता से सुलझा लेती हैं
    इस प्रकार घरेलू शिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं और इसके बिना स्त्री को यदि व्यर्थ ढोंग और मानसिक विलास भी कहा जाये तोअत्युक्ति न होगी ,क्योंकि इस शिक्षा से अनभिज्ञ स्त्री घर क़ी गति एवम प्रबंध का ठीक से संतुलन नहीं रख सकेगी |स्त्री शिक्षा को पूर्ण एवम सार्थक बनाने के लिए आवश्यक हैं कि उन्हें समुचित शिक्षा दी जाए!

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  4. nice lines
    it's the voice of all indian girls
    who still fight with the society and not leave there studies after facing all the problems

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  5. यूँ अकेले लड़ रही है मेरी बेटियाँ
    नया ज़माना गढ़ रहीं है मेरी बेटियाँ

    सदियों से सताया गया बेटियों को खूब
    रुढियों से लड़ रही हैं मेरी बेटियाँ

    अधिकार न कोई दिया समझी गयी वे जूतियां
    हकों के लिए लड़ रही है मेरी बेटियाँ

    निरक्षरों की भीड़ थी पुरे ज़माने में
    विज्ञानं अब पढ़ा रहीं हैं मेरी बेटियाँ

    गाँव-गाँव, शहर-शहर धूम है मची
    चाँद सी उभर रही हैं मेरी बेटियाँ

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  6. धन्यवाद् दोस्तों.... और बहुत खूब लिखा है विष्णु जी... शुक्रिया

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  7. नदीम कुरैशीFriday, January 06, 2012 11:18:00 am

    चीज़ सजाने की माना,
    दमका ली महल-हवेली!

    --क्या खूब लिखे है भाई साहब ये शब्द
    माशाल्लाह

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  8. हमको कभी न
    मानुस समझा,
    समझा गुड़ की भेली!
    चीज़ सजाने की माना,
    दमका ली महल-हवेली!

    बचपन से ही बोझ कहा,
    सारी आज़ादी ले ली!
    हाथ की रेखा
    बदली मैंने,
    देखो मेरी हथेली!
    bahut khoob sumit
    nice poem
    it nice to have someone from ujjain doing blogging
    iam also from ujjain


    mere blog par bhi aaiyega
    umeed kara hun aapko pasand aayega
    http://iamhereonlyforu.blogspot.com/

    ReplyDelete
  9. डॉ. शीतल पाटीदारTuesday, April 03, 2012 11:50:00 am

    कितनी अनजान थी वो अब तक अपनी ताकत से!
    आईने में वो खुद को देखती और वैसी ही दिखने की कोशिश करती जैसी उसे लोग देखना चाहते थे.
    उसकी खुद की पसंद-नापसंद से तो उसका कभी वास्ता ही नहीं रहा,
    इसी लिए अपने भीतर छुपे अपने रूपों से अनजान थी अब तक

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  10. very nice sumit keep it up

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  11. हाथ में उसको कलम का आना अच्छा लगता है ,
    उसको भी स्कूल को जाना अच्छा लगता है

    बड़ा कर दिया ग़र्दिश ने वक़्त से पहले ,
    वरना सिर पर किसको बोझ उठाना अच्छा लगता है

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  12. अच्छी जानकारी।

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  13. 7guowenha0921
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