Saturday, 12 October 2013

ज्ञान और अज्ञान के बीच

आज जब कुछ लोगो के बीच बैठ कर उनकी बातें सुन रहा था, वहाँ वो सब किसी शख्स की बुराई कर रहे थे.. 
सभी के अपने-अपने मत थे वहाँ.. आखिर सब एक से बढ़ कर एक ज्ञानी जो थे.… कोई कह रहा था की वो शख्स ऐसा है, कोई कह रहा था की वो शख्स वैसा है.. सभी के अपने अपने विचार थे जो उन्होंने अलग अलग पहलुओ को देख कर बनाये थे। 
 में उन लोगो की बातें सुन कर बस यही सोच रहा थे की हम किसी के बारे में कुछ कहने, सोचने या निर्णय लेने वाले होते कौन है। किसने दिया हमें इतना हक़…। और सब से ज़रूरी बात तो ये की हमें इस से मिल क्या रहा है?
सत्‍य के संबंध में विवाद सुनता हूं, तो आश्चर्य होता है। निश्चय ही जो विवाद में हैं, वे अज्ञान में होंगे। क्योंकि, ज्ञान तो निर्विवाद है। ज्ञान का कोई पक्ष नहीं है। सभी पक्ष अज्ञान के हैं। ज्ञान तो निष्पक्ष है। फिर, जो विवादग्रस्त विचारधाराओं और पक्षपातों में पड़ जाते हैं, वे स्वयं अपने ही हाथों सत्य के और स्वयं के बीच दीवारें खड़ी कर लेते हैं। मेरा यही मानना है की: विचारों को छोड़ों निर्विचार हो रहो। पक्षों को छोड़ो और निष्पक्ष हो जाओ। क्योंकि, इसी भांति वह प्रकाश उपलब्ध होता है, जो कि सत्य को उद्घाटित करता है।


एक पुराना लेख याद आता है जब एक अंधकार पूर्ण गृह में एक बिलकुल नए और अपरिचित जानवर को लाया गया। उसे देखने को बहुत से लोग उस अंधेरे में जा रहे थे। चूंकि घने अंधकार के कारण आंखों से देखना संभव न था, इसलिए प्रत्येक उसे हाथों से स्पर्श करके ही देख रहा था। एक व्यक्ति ने कहा- राजमहल के खंभों की भांति है, यह जानवर। दूसरे ने कहा- नहीं, एक बड़े पंखे की भांति हैं। तीसरे ने कुछ कहा और चौथे ने कुछ और। वहां जितने व्यक्ति थे, उतने ही मत भी हो गये। उनमें तीव्र विवाद और विरोध हो गया। सत्य तो एक था। लेकिन, मत अनेक थे। उस अंधकार में एक हाथी बंधा हुआ था। प्रत्येक ने उसके जिस अंग को स्पर्श किया, उसे ही वह सत्य मान रहा था। काश! उनमें से प्रत्येक के हाथ में एक-एक दिया रहा होता, तो न कोई विवाद पैदा होता, न कोई विरोध ही! उनकी कठिनाई क्या थी? प्रकाश का अभाव ही उनकी कठिनाई थी। वही कठिनाई हम सबकी भी है। जीवन सत्य को आतंरिक प्रकाश में ही जाना जा सकता है। जो विचार से उसका स्पर्श करते हें, वे निर्विवाद सत्य को नहीं, मात्र विवादग्रस्त मतों को ही उपलब्ध हो पाते है।
सत्य को जानना है, तो सिद्धांतों को नहीं, प्रकाश को खोजना आवश्यक है। प्रश्न विचारों का नहीं, प्रकाश का ही है। और, प्रकाश प्रत्येक के भीतर है। जो व्यक्ति विचारों की आंधियों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, वह उस चिन्मय-ज्योति को पा लेता है, जो कि सदा-सदा से उसके भीतर ही जल रही है।

19 comments:

  1. ज्ञान और अज्ञान में इतना ही भेद है कि बीच में एक भ्रम का परदा लगा हुआ है। जहां परदा खुल गया, अज्ञान समाप्त हो गया, ज्ञान की ज्योति जग गई, मनुष्य जो अपने आपको भूला हुआ था, होश में आ गया कि मैं कौन हूं? मेरा लक्ष्य क्या है? मैं क्या करने आया था और क्या करने लगा? मैं क्या लेकर आया था और मुझे क्या लेकर जाना है?

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  2. खुबसूरत लेख सुमीत
    कुछ अंधकार पर हरिवंश राय बच्चन का लिखा


    अंधकार बढ़ता जाता है!
    मिटता अब तरु-तरु में अंतर,
    तम की चादर हर तरुवर पर,
    केवल ताड़ अलग हो सबसे अपनी सत्ता बतलाता है!
    अंधकार बढ़ता जाता है!

    दिखलाई देता कुछ-कुछ मग,
    जिसपर शंकित हो चलते पग,
    दूरी पर जो चीजें उनमें केवल दीप नजर आता है!
    अंधकार बढ़ता जाता है!

    ड़र न लगे सुनसान सड़क पर,
    इसीलिए कुछ ऊँचा स्वर कर
    विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है!
    अंधकार बढ़ता जाता है!

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  3. yes it true that we have to be concentrate on what life want to teach us rather in wasting time for considering such a cheap thinking

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  4. ज्ञान का सामान्य सा अर्थ है, आत्म चेतना की द्रष्टि, यानी आत्म बोध का जागरण. और, अज्ञानता मे खुद की विवेचना का, या आंकलन करने जैसा कोई भाव ही नही होता है.

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  5. पिछले २ सालों की तरह इस साल भी ब्लॉग बुलेटिन पर रश्मि प्रभा जी प्रस्तुत कर रही है अवलोकन २०१३ !!
    कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !
    ब्लॉग बुलेटिन के इस खास संस्करण के अंतर्गत आज की बुलेटिन प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (14) मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. bilkul. sabhi ek se badh kar ek gyani hai. shayad kabhi khud ke ya zindagi ke baare mein chintan karte to aisa kabhi na kahte.

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  7. सत्‍य को जानना है तो, सिद्धांतों को नहीं, प्रकाश को खोजना आवश्‍यक है
    बहुत सही कहा .... सशक्‍त प्रस्‍तुति

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    1. gyan agyaan kuch nahi hota sab logo ki bharm hai aadmi ke andar yah basa hai ki yah aadami gyani hai aur ye aadami agyani hai iska aasay yahi hai ki logo ke andar hi bharam paida hota hai .

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  14. ख्वाहिश नहीं मुझे मशहूर होने की,
    आप पहचानते हो बस इतना ही काफी है।
    अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मुझे,
    क्यों कि जिसकी जितनी जरूत थी उसने उतना ही पहचाना मुझे।

    एक अजीब सी दौड़ है जिंदगी, जीत जाओ तो कई अपने पीछे छुट जाते हैं,
    और हार जाओं कई अपने पीछे छोड़ जाते हैं।

    बैठ जाता हूं अक्सर मिटटी पर,
    क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी। लगती है।
    आप मुझे पहचानते हो बस इतना ही काफी है..........।

    मैंने समुद्र से सीखा जीने का सलीका,
    चुप-चाप से बहना और अपनी मौज में रहना।
    ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है,
    पर मैं सच कहता हूं मुझमें कोई फरेब नहीं हैं।

    जल जाते हैं मेरे अंदाज से मेरे दुश्मन,
    क्योंकि एक मुद्दत से मैंने न तो मोहब्बत बदली और न ही रिश्तेदार बदले।।

    ख्वांहिश नहीं मुझे मशहूर होने की, आप पहचानते हो बस इतना ही काफी है.......।

    घड़ी खरीदकर हाथ में क्याु बांधली, वक्त पीछे ही पड़ गया मेरे..............।
    जीवन की भागदौड़ में क्यूं वक्त के साथ रंगत खो जाती है।
    हसती खेलती जिंदगी भी आम हो जाती है।
    एक सवेरा था जब हसकर उठते थे हम,
    और
    आज बिना मुस्काराए ही शाम हो जाती है।
    ख्वाहिश नहीं मुझे मशहूर होने की, आप पहचानते हो बस इतना ही काफी है......।

    कितने दूर निकल गए हम....................रिश्तोंप को निभाते-निभाते,
    खुद को खो दिया हमनें ......................अपनों को पाते पाते।
    ख्वाहिश नहीं मुझे मशहूर होने की, आप पहचानते हो बस इतना ही काफी है.......।
    लोग कहते हैं हम मुस्कु राते बहोत/बहुत है, और
    हम थक गए दर्द छुपाते छुपाते।

    खुश हूं और सबको खुश रखता हूं।
    लापरवाह हूं फिर भी सबकी परवाह करता हूं।
    और अंत में.........
    मालूम है कोई मोल नहीं मेरा,
    फिर भी मैं कुछ अनमोल लोगों से रिश्ता रखता हूं। अनिल

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